Friday, 23 February 2018

वापिस हुए आज उसी सफ़र पर 
नाज़ुकता दिल की अब भी वही थी......
 शिक़वा भी था ख़ुद से अब
निगाहें ''वो '' साथ फ़िर ढूंढ रही थी .....


अक्सर ज़िकर कर देते हैं आपका
रूबरू कभी खुद भी हो जाया कीजिए ....

कभी तकल्लुफ़ कीजिये हमारी गली में आने का
कभी तो इश्क़ आप हमसे कीजिए। .....

नाउम्मीद सी एक उम्मीद रखते हैं
शायद मंज़रर आज  कुछ ऐसा हो  जाये
हम चले जाये जब उनकी दुनिया से,
उन्हें तब हमसे इश्क़ हो जाए। ....



"......सफ़र में चलते चलते मुलाक़ात उनसे हो गई, इश्क़ से बचते फिरते थे, अब उनसे बात भी हो गई...  सोचा ना था मिलेंगे...